Tuesday, July 23, 2019


पूरा हुआ एक और पड़ाव, एक और मक़ाम,
मैंने पूछा क्या यहीं रुकना है या चलना है?
न कुछ जवाब आया और न आई कोई सदा,
मैं देखता रहा राहगुजर के कुछ मुसाफिरों को, 
सोचा क्या पता कोई रहबर ही बन जाये,
लेकिन सब मसरूफ थे अपनी ही राह में, 
मैं भी रुका रहा, इधर उधर भटकता रहा, 
तभी एक अक्स दिखा जो मुझे बुला रहा था, 
पुरजोर खुद की ओर मुझे खींचे जा रहा था,
 मैं भी कम न था, अहम् में भी काफी दम था, 
लगा रहा चुम्बक से लोहे को अलग करने में,
लेकिन उस अक्स ने ऐसा तिलिस्म फैलाया,
मैं बहुत तेज से जाके एक आईने से टकराया,
चोट बहुत लगी और आइना चकनाचुर हुआ,
फिर कहीं जाके उससे मेरा इस्तेकबाल हुआ, 
मैंने फिर पूछा क्या यहीं रुकना है या चलना है?
मेरे अंदर के बाशिंदे ने कुछ यूँ फरमाया,
पड़ाव पे जो ठहर गया, मक़ाम पे जो रुक गया,
भला वो वाक़ई में क्या कभी मुसाफिर हुआ?

No comments:

Post a Comment